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Monday, 15 June 2015

कैसे मिली मिथिला यूनिवर्सिटी को दरभंगा राज का मुख्यालय

१९७५ आपातकाल का समय दरभंगा के जिलाधिकारी ने डी आई आर के तहत दरभंगा राज के हेड ऑफिस पर कब्ज़ा कर लिया . महाराजा के विल के एक्सकुएटर पंडित लक्ष्मी कान्त झा ने इसके खिलाफ माननीय पटना उच्चन्यायालय में एक याचिका दाखिल की .फिर सरकार से हुई समझौता और कुछ लाख रूपये में दे दी सैकड़ों एकड़ जमीन – भवन ,महारानी ने भी राजकुमार शुभेश्वर सिंह के सहयोग से  बेच दी अपना महल नरगोना और संलग्न बगीचा .....
जिलाधिकारी ,दरभंगा के आदेश संख्या १८३५ /एल  दिनांक १६.८. ७५ के द्वारा एक्सेकूटर लक्ष्मी कान्त झा को डिफेन्स ऑफ़ इंडिया रूल १९७१ के सुसंगत प्रावधान के आलोक में दरभंगा राज के भवन एवं भूमि अधिगृहित करने की सूचना दी गयी जिसके खिलाफ पंडित लाक्स्मिकांत झा ने माननीय पटना उच्च न्यायालय में सी . डब्लू .जे . सी . नंबर १७८६ /७५ दाखिल की . वाद के निपटारा से पूर्व हीं बिहार सरकार और दरभंगा राज के बीच समझौता हुई और जिलाधिकारी के आदेश और उक्त वाद को वापस ले लिया गया और १२.९.१९७५ को हुई इस समझौता के आलोक में १३३ एकड़ भूमि और भवन विस्वविद्यालय हेतु दी गयी . महारानी और दरभंगा हाउस प्रॉपर्टी लि . द्वारा दी गयी जमीन इसके अतिरिक्त है .-- जारी देखते रहें मेरा ब्लॉग . 
फॅमिली सेटल्मेंट के तहत schedule IV और V किसी की निजी सम्पति नहीं है जो निम्न है --
       १. न्यूज़ पेपर & पब्लिकेशन लि. का ५००० शेयर
        २. राज हॉस्पिटल कंपाउंड एरिया , दरभंगा

         ३.दरभंगा के गिरीन्द्र मोहन रोड स्थित बंगला नंबर २ और ५  और ८ जिसका कुल रकवा ५  बीघा १६ कठा मकान सहित
        ४. ४२ /१ , ४२ A & ४२ B चौरंगी रोड , कोलकाता
         ५. ५६ राधा बाज़ार स्ट्रीट , कोलकाता
          ६. वाल्फोर्ड ट्रांसपोर्ट ( E. I.)
           ७ . डेनवी रोड स्थित  क्वार्टर ( इ टाइप के २० और २७ नंबर को छोड़ कर )
           ८. मधुबनी स्थित भौड़ा गढ़ी
            ९. मुजफ्फरपुर लीज होल्ड
             १० . रांची की जमीन
              ११. कन्ह्याजी कोठी ,आनंदबाग  के  पीछे रकवा २ बीघा १० कठा
                १२. मोसद्दी लेन , दिवानिताकिया  और कैदराबाद
              १३. सोती लाइन के उत्तर से ४ क्वार्टर
               १४. तालाब - दिवानिताकिया , बलभद्रपुर , सागरपुर , नीम सागर , बेला टैंक ,अल्हुअपोखर, बाबूलाल                      वाला पोखर  
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                              उपरोक्त सम्पतियों में अधिकांश बेच दी गयी है वा कब्ज़ा दे दिया गया है . चूँकि यह ट्रस्ट की सम्पति है अतः इसकी जाँच होनी चाहिए ताकि  महाराजा के अंतिम विल के अनुरूप जन कल्याण के कार्य में इसका उपयोग हो सके और ट्रस्ट की सम्पति के साथ  अनियमितता ,लूट बंद हो .

Tuesday, 9 June 2015

ESTATE OF LATE MAHARAJADHIRAJA SIR KAMESHWAR SINGH OF DARBHANGA AS PER FAMILY SETLEMENT 1987

                                                   SCHEDULE --1
Statement showing estimated value of immovable & Movable Properties of the Estate of Late Maharajadhiraja Dr. Sir Kameshwara Singh of Darbhanga.
 Ptroperties located outside Darbhanga
 1. 42 Chowringhee , Calcutta
2. 5G Radhabazar Street
3. Varanasi - Darbhanha Palace, Nilkanth, Rani Kotha ,Mirghat ,Gomath, Manikarnika Land
4. Allahabad - 22 Chathem line, Darbhanga Castle
5. Baidyanath Dham -Land near Shivganga Tank & Salona
6. Ranchi Land
7. Muzaffarpur vLease Hold
8. Madhubani  Bhoara Palace
9. Kamakhya Hill, Assam
10. Mofassil Quartar in Circles.
Properties located at Darbhanga
1. Rambagh Compound Area ( about 54 Bighas )
   Note-- The above mentioned area within Rambagh compound is exclusive of the following:--
   a. Residential House known as Rambagh Palace ( with some adjoining land ) in which Maharani Rajylakhmi resided and which vested absolutely as per terms of the WILL in Kumar Subheshwar Singh after the demise of the said Maharani in 1976
   b. Under Kameshwara Religious Trust namely Kankali Mandir, Hari Mandir , Devi Mandir , Gsauni Ghar.
    c. One Tank and One Temple of Lakshmipur Trust.
     d.  Rameshwara Singh Regional Archive ( gifted to Govt. of Bihar )
 2. Hospital Area ( about 12 Bighas )
 3. A Type Bunglows On G. M. Road
  4. B type Quarters 1 to 4.
 5. C type quartes 1 to 6., Danby Road
  6. D type Quarters 7 to 14., Danby Road
 7. E type Quarters 14
 8. F type Quarters 15 Single Room - Twin quarters
  9. G type 6 Tiled House Jt.
10. Kanhyaji Kothi
11.Moment's Quarter
 12. Kabraghat House
13. Murari House
14. Ramkrishna Babu
15. Old S. Boarding House
16. 4 Quarters North of Soti Lines.
17. Land Kameshwara Market - Rly Station
18. Mosaddi Lane , Diwani takia
19. Mosaddi Lane at Kaidrabad
20. Land & Structures to Cold Storage (P) Ltd.
21. Tank- Sagarpur, Nim Sagar, Babulalwaia, Alhuapokhar, Bela Tank, Kabraghat, Diwani takia Balbhadarpur-L. sarai.
MOVEBLES
 Jewellery, Gold Cut Coins ,Time Piece & Watches.including 3 Diamonds Buttons ,Habib Gold Coins , Belgium Gel Coins , Cuff Link Pairs .
Shares & Securities Raj Controlled Copanies
  News Paper & Publication Ltd, Walfords , Darbhanga Laheriasarai Electric Supply Corporation Ltd, Darbhanga Investments, Darbhanga Properties, Darbhanga Cold Storage , Darbhanga Dairy , E. N. G. Co., Darbhanga Press, Darbhanga Sugar , Darbhanga Construction, Darbhanga Industries, Thacker Spink & Co., Park Acceptance.
 OTHERS MARKETABLE & IN LIQUIDATION:-
Rameshwar Jute , Telco, G.K.W., Indian Iron , Ashk Paper, Clibe Mills, Hindustan Bicycle, Indian Machinary, Press Syndicate, Newspaper Allahabad , Richardson & Crudas, Khas Karanpura, Buduan Elec.
 Security Account
 Elgin MIll, Titaghar


Schedule--II( Maharanidhirani Kamsundari Saheba )
Schedule-III (Sriman Rajeshwara Singh & Sriman Kapleshwara Singh)
Schedule-IV ( Kameshwara Singh Public Charitable Trust )
Schedule -V ( Katyayni Dai, , Dibyayani Dai, Sriman Ratneshwara Singh,, Rashmeshwara Singh,      Sriman Rajneshwara Singh,Smt. Netyayani Dai, Chetana Dai, Draupadi Dai, Anita Dai, Sunita Dai.
Schedule _ VI Properties earmarked for sale for payment of Liabilities.

Monday, 1 June 2015

महाराजा कामेश्वर सिंह के बाद दरभंगा राज का पतन

महाराजा डा . सर कामेश्वर सिंह,सांसद (राज्यसभा )  दुर्गा पूजा  के अवसर  पर  अपने    निवास  दरभंगा हाउस  . मिड्लटन  स्ट्रीट ,कोल्कता  से  अपने  रेलवे  सैलून  से  नरगोना  स्थित  अपने रेलवे  टर्मिनल  पर  कुछ  दिन  पूर्व  उतरे  थे  . १ अक्टुबर १९६२ आश्विन  शुक्ल  तृतीया  २०१९  को  नरगोना  पैलेस  के  अपने  सूट  के  बाथरूम  के   नहाने  के  टब  में  मृत  पाये  गए ।  आनन फानन  में  माधवेश्वर  में  इनका दाह संस्कार दोनों महारानी की उपस्थिति में  कर दिया  गया।बड़ी महारानी को देहांत की सुचना मिलने पर अंतिम दर्शन के लिए सीधे शमशान पहुंचना पड़ा था .  महाराजा कामेश्वर सिंह को संतान नहीं था .इनके उतराधिकार को लेकर उनके कुछ प्रिय व्यक्तियों के मन में आशा थी उनमे छोटी महारानी जो महाराजा के साथ रहती थी और महाराजा के भगिना श्री कन्हैया जी झा जो इंडियन नेशन प्रेस के मैनेजिंग डायरेक्टर थे प्रमुख थे .राजकुमार  शुभेश्वर सिंह और  राजकुमार  यजनेश्वर  सिंह  वसीयत  लिखे जाने के समय  नाबालिक  थे  और  उनकी  शादी  नहीं हुई थी सबसे  बड़े  राजकुमार  जीवेश्वर सिंह  की  दूसरी  शादी  नहीं  हुई थी . शायद महाराजा को अपनी मृत्यु की अंदेशा था l  मृत्यु  से पूर्व ५ जुलाई १९६१ को    कोलकाता  में  इन्होने  अपनी   अंतिम वसीयत  की  थी  जिसके  एक  गवाह  पं.द्वारिका नाथ झा  थे जो  महाराज के ममेरा भाई थे और  दरभंगा  एविएशन ,कोलकाता  में मैनेजर  थे l मृत्यु का समाचार मिलने पर वे कोलकाता से दरभंगा पहुंचे और वसीयत के प्रोबेट कराने की प्रक्रिया शरू करवा दी lकोलकाता  उच्च न्यायालय द्वारा वसीयत  सितम्बर १९६३ को  प्रोबेट  हुई  और  पं. लक्ष्मी कान्त झा , अधिवक्ता  ,माननीय  उच्चतम न्यायालय ,पूर्व मुख्यन्यायाधीश पटना हाई कोर्ट ग्राम – बलिया ,थाना – मधुबनी पिता पंडित अजीब झा  वसीयत के एकमात्र  एक्सकुटर  बने और एक्सेकुटर के  सचिव बने पंडित द्वारिकानाथ झा l वसियत के अनुसार   दोनों  महारानी  के जिन्दा  रहने तक  संपत्ति  का  देखभाल  ट्रस्ट  के अधीन  रहेगा और दोनों महारानी के स्वर्गवाशी होने के बाद संपत्ति को तीन हिस्सा में बाँटने जिसमे एक हिस्सा दरभंगा के जनता के कल्याणार्थ देने और शेष हिस्सा महाराज के छोटे भाई राजबहादुर विशेश्वर सिंह जो स्वर्गवाशी हो चुके थे के पुत्र  राजकुमार जीवेश्वर सिंह ,राजकुमार यजनेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह के  अपने ब्राह्मण  पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच वितरित किया जाने का  प्रावधान था l दोनों महारानी को रहने के लिए  एक – एक महल ,जेवर –कार और कुछ संपत्ति मात्र उपभोग के लिए और दरभंगा राज से प्रति माह कुछ हजार रूपये माहवारी खर्च देने का प्रावधान था .
l  पंडित  लक्ष्मीकांत  झा  वसीयत के एक मात्र  ,एक्सेक्यूटर  बहाल  हुए और  ओझा  मुकुंद झा  जो  महाराज  के  बहिनोय   (  बहन के पति )थे  ट्रस्टी और  तीसरे  ट्रस्टी  पंडित  गिरीन्द्र  मोहन  मिश्र  हुए जो महाराज के सलाहकार थे और पक्के कांग्रेसी थे . हुए l  गौरतलब  है  कि  एक  श्रोत्रिय , एक जैवार  और एक  शाकलदीपी  मैथिल  ब्राह्मण ट्रस्टी  थे । ये तीनो ट्रस्टी महाराजा से उम्र में बड़े थे तो क्या महाराजा को अपने मौत का आभास था ? दरभंगा  राज  के  जनरल मेनेजर मि. डेनवी के समय रहे असिस्टेंट मेनेजर   पं.  दुर्गानन्द  झा के जिम्मे दरभंगा राज का प्रबंध था l वे  राजमाता साहेब के फूलतोड़ा के पुत्र थे और महाराज के बचपन के मित्र थे वे उस ज़माने के स्नातक थे और   पंडित  द्वारिका नाथ  झा ,महाराज के ममेरे भाई एक्सेक्यूटर के सचिव   मनोनीत हो गये और कोलकाता से आकर गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला नंबर ५ में अपने मामा पं.यदु दत्त झा जो दरभंगा राज के अनुभवी और दझ पदाधिकारी थे जिन्हें मिस्टर देनबी ने अपने बाद जनरल मेनेजर के लिए अनुशंसा की थी जिनका उल्लेख १९३४ के भूकंप में राहत कार्यक्रम में कुमार गंगानंद सिंह ने की है ,के बगल के बंगला में रहने लगे l  दरभंगा  राज का   क्रियाकलाप महाराजा के मृत्यु के बाद  मुख्यतः  लक्ष्मीकांत  झा जो बिहार के महाधिवक्ता से सीधे पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने थे  और  दुर्गानन्द  झा  और   पंडित  द्वारिका  नाथ  झा  के  इर्द -गिर्द  था  l 
सबसे  पहले  तीनो  राजकुमार ( महाराजा  के भतीजा ) ने  बेला  पैलेस सहित ८० एकड़  का  १९६८ में  सौदा  किया  और  दरभंगा  में बिना  आवास के  हो गए।  बड़ी  महारानी  राजलक्ष्मी  जी  ने सबसे  छोटे  राजकुमार  शुभेस्वर  सिंह   घर  का नाम  शुभु  को  अपने  रामबाग   में  रखा  , वसियत के अनुसार बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी के मृत्यु के बाद उनके महल पर राजकुमार शुभेश्वर सिंह का स्वामित्व होगा . बड़े  कुमार  जीवेश्वर सिंह घर  का नाम  बेबी   राजनगर  रहने  लगे और  उनकी  बड़ी  पत्नी  राजकिशोरी  जी  अपनी  दोनों  बेटी  के  साथ  और  मझले  राजकुमार  यजनेश्वर  सिंह  घर का नाम  जुग्गु  अपने  परिवार  के साथ  यूरोपियन  गेस्ट  हाउस   ऊपरी मंजिल पर  उत्तर  और दझिण  भाग  में   आ  गए। बेला  पैलेस  के सौदा होने के कालखंड में मार्च १९६७ में ९२ लाख रूपये में राज ट्रेज़री का गहने और जवाहरात की  नीलामी डेथ ड्यूटी चुकाने के लिए हुई  जिसमे  मशहुर Marie Antoinettee हार , धोलपुर क्राउन , नेपाली हार, और हीरे – जवाहरात थे. जिसे  बॉम्बे  के  नानुभाई  जौहरी   ने  खरीदा l  बाम्बे  के गोरेगांव  में  नानूभाई  की  नीरलोन नाम  की  कंपनी भी  है .   उसके  बाद  ४५ लाख में  रामेश्वर  जूट मील , मुक्तापुर  बिडला  के हाथ  ,फिर  वाल्फोर्ड ट्रांसपोर्ट कंपनी ,कोलकाता डेविड के हाथ , दरभंगा हवाई अड्डा केंद्र सरकार ने ले ली , सुगर  फैक्ट्री लोहट और सकरी ,अशोक पेपर मील,हायाघाट , दरभंगा - लहेरियासराय इलेक्ट्रिक सप्लाई  बिहार सरकार ने .विश्राम कोठी ,दरभंगा और बॉम्बे का पेद्दर रोड ,इनकम टैक्स के हाथ , दरभंगा हाउस शिमला , दरभंगा हाउस दिल्ली सेंट्रल गवर्नमेंट को , रांची का दरभंगा हाउस सेंट्रल कोल् फील्ड लिमिटेड को ,  फिर  नरगोना  पैलेस , राज हेड ऑफिस , यूरोपियन गेस्ट हाउस , मोतीमहल ,राज फील्ड ,राज प्रेस ,देनवी कोठी ,लालबाग गेस्ट हाउस ,बंगलो नो. ६ और ११ ,राज अस्तबल ,श्रोत्रि लाइन , सहित सैकड़ों एकड़ जमीन  मिथिला विश्वविद्यालय को ,  रेल ट्रैक और  सलून ,वाटर  बोट  , बग्घी ,फर्नीचर  ,कार रोल्स रायस- बेंटली – बियुक –पेकार्ड –शेवेर्लेट – प्लायमौथ – ५० एच् . पी जॉर्ज V बॉडी आदि l  बड़ी महारानी के १९७६ में देहांत होने और १९७८ में पंडित लक्ष्मी कान्त झा के देहांत के बाद दरभंगा राज का कार्य ट्रस्ट के अधीन हो गया .श्री मदनमोहन मिश्र ( गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बड़े पुत्र ) ,श्री द्वारिका नाथ झा और श्री दुर्गानंद झा तीनो ट्रस्टी के अधीन .फिर श्री दुर्गानंद झा के देहांत के बाद १९८३ के आसपास  श्री गोविन्द मोहन मिश्र ट्रस्टी बने और फिर उनके स्थान पर श्री कामनाथ झा ट्रस्टी बने l राजकुमार शुभेश्वर सिंह १९६५ के आसपास दरभंगा राज के मामले में सक्रिय हो गये थे उन्हें रामेश्वर जूट मिल ,फिर सुगर कंपनी और न्यूज़ पेपर & पब्लिकेशन लिमिटेड का जिम्मेवारी मिली . सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह  राजनगर ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी रहे दरभंगा राज के मामले में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं था ,राजनगर से वे गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बाद बंगला नंबर १ ,गिरीन्द्र मोहन रोड में अपने दूसरी पत्नी और ५ पुत्री के साथ रहने लगे . स्व . महाराजाधिराज के तथाकथित परिवार के सदस्यों ने माननीय उच्चतम न्यायालय में एक फॅमिली सेटलमेंट नो . १७४०६ -०७ ऑफ़  १९८७ में  फॅमिली सेटलमेंट हुआ .जिसमे महाराजा के वसीयत के विपरीत छोटी महारानी के जिन्दा रहते  कुल संपत्ति का एक चौथैय हिस्सा पब्लिक चैरिटी को मिला और १/४ छोटी महारानी ,१/४  राजकुमार शुभेश्वर सिंह और उनके दोनों पुत्र को और १/४ में मंझले राजकुमार के पुत्रों और बड़े राजकुमार के ७ पुत्रियों को मिला . इंडियन नेशन प्रेस ( न्यूज़ पेपर & पब्लिकेशन लि,) ४२ चौरंगी (कलकत्ता ) अब  रामबाग  की अधिकांश जमीन  भी  बिक  गयी   है सबसे पहले दिलखुश बाग   का एरिया बिका फिर सिंह द्वार के समीप  और सुनने में है कि मधुबनी स्थित भौरा गढ़ी का भी डील हो गया है और तालाब भरने का कार्य जारी है .राजकुमार  जीवेश्वर सिंह की प्रथम पत्नी लहेरियासराय में और दूसरी यानि छोटी पत्नी बंगला नो. १ , गिरीन्द्र मोहन  रोड में रहती है .जीवेश्वर सिंह स्वर्ग्वाशी हो चुके हैं मंझले राजकुमार  अभी बंगला नो.९ गिरीन्द्र मोहन रोड में पत्नी के साथ रहते है और बीमार हैं  ,राजकुमार  यजनेश्वर  सिंह  को तीन पुत्र जिसमे मंझले का दिल्ली में देहांत हो गया शेष दोनों पुत्र से संतान अभी नहीं हैं  व अपनी पत्नी के साथ बंगला न. ९ ,गिरीन्द्र मोहन रोड में  रहते हैं .,राजकुमार शुभेश्वर सिंह को  दो पुत्र हैं बड़ा अमेरिका में रहते है और छोटा  दिल्ली में रहते हैं और दरभंगा प्रवास  में रामबाग में  , श्री शुभेश्वर सिंह का देहांत उनके पत्नी के देहवसान के कुछ वर्षों बाद  दिल्ली में अपने आवास पर  हो गया . गिरीन्द मोहन रोड के बंगला नंबर  २ और  ५ तथा  न्यूज़  पेपर  & पब्लिकेशन  लि. में  ५ लाख  का  शेयर  और  १८ लाख  २५ हजार  रूपये  कैश   पब्लिक चैरिटी का था   . अब पब्लिक चैरिटी का  महाराजा कामेश्वर सिंह मेमोरियल हॉस्पिटल  की  करीब १० बीघा  जमीन और मकान शेष बचे हैं जिसके एक छोटे हिस्सा में अस्पताल चलता है  .राजनगर के मंदिरों में पूजा –पाठ ,भोग के लिए १९२९ में महारजा कामेश्वर सिंह ने एक ट्रस्ट और भवनों के देख रेख के लिए एक ट्रस्ट बनाया जिसके निमित दर्शाए गये सम्पति के आय से इसकी देखरेख का प्रावधान है जिसे बेचने का अधिकार किसी को नहीं दी गयी . इसीतरह १०८ मंदिरों के लिए ट्रस्ट और सीताराम ट्रस्ट  है .छोटी महारानी महाराजा के बाद अधिकांस समय दरभंगा हाउस केंद्र सरकार द्वारा लेने के बाद उससे सटे आउट हाउस में दिल्ली में रहने लगी और दरभंगा आने पर  नरगोना पैलेस में . १९८० के आसपास से   नरगोना कैंपस में बेला पैलेस के सामने नवनिर्मित कल्याणी हाउस में आने पर   रहती हैं. १९९० से अधिक समय दरभंगा में रहने लगीं है  और दरभंगा रिलीजियस ट्रस्ट जिसके अधीन १०८ मंदिर है और सीताराम ट्रस्ट जिसके अधीन वनारस के बांस फाटक  ,गोदोलिया चौक के नजदीक राममंदिर आता है के एकमात्र ट्रस्टी हैं  उक्त मंदिर के गेट के समीप कुछ अंश जमीन  की बिक्री कर दी गयी है .इनसे पूर्व बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी इसके ट्रस्टी थीं.राजलक्ष्मी जी ने महाराज कामेश्वर सिंह के चिता पर माधवेश्वर में मंदिर का निर्माण करवायी थी .छोटी महारानी कामसुन्दरी जी महाराज कामेश्वर सिंह कल्याणी ट्रस्ट बनवायी जिसके  तहत किताबों का प्रकाशन ,महाराजा कामेश्वर सिंह जयंती आदि कराती हैं .पंडित दुर्गानंद झा ,मेनेजर के ट्रस्टी बनने के बाद  श्री केशव मोहन ठाकुर ,पूर्व  IAS की नियुक्ति हुई और उनके  बाद दरभंगा राज के एक  पदाधिकारी श्री मित्रा और फिर श्री बुधिकर झा मेनेजर रहे .अभी महाराजा कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट के तीन ट्रस्टी श्री उदयनाथ झा ( महारानी के बड़ी बहन का लड़का ) जो महारानी के प्रतिनिधि हैं  और राजकुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र हैं  दरअसल पब्लिक चैरिटेबल  ट्रस्ट में ६ और  ट्रस्टी बनाने का  प्रावधान  है . ओझा मुकुंद झा के एकमात्र पुत्र कन्हया जी झा का देहांत उनके समय हीं हो गया था .कन्हया जी इंडियन नेशन प्रेस के मैनेजिंग डायरेक्टर थे उनके बाद राजकुमार शुभेश्वर सिंह मैनेजिंग डायरेक्टर बने .ओझा मुकुंद झा अपना दरभंगा स्थित सारामोहनपुर हाउस मिथिला विश्वविद्यालय के स्थापना के समय दिए थे वे खुद कन्ह्याजी कोठी जो लक्ष्मीश्वर विलास के पीछे है में रहते थे , उन्होंने जनकल्याण ट्रस्ट बनाये और अपना अधिकांश सम्पति दान कर दी .पंडित द्वारिका नाथ झा गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला  नंबर ५ में और पंडित दुर्गानंद झा बंगला नंबर ८ में , श्री मदनमोहन मिश्र बंगला नंबर २ में उक्त तीनो  बंगला पब्लिक चैरिटी के हिस्से में था ,बंगला नंबर ३ महारानी के  और बंगला नंबर ४ राजकुमार शुभेश्वर सिंह के संतान के हिस्से में आया .जिसमे सभी बिक गये है मात्र बंगला नंबर ४ का मुख्य मकान बचा है .दरभंगा राज का पतन महाराजा के देहांत के ४-५ साल के बाद शरू हुआ जो ७५-७६ तक अधोगति को प्राप्त हो गया .८९-९० में इंडियन नेशन और आर्यावर्त समाचार के प्रकाशन बंद होना दरभंगा राज के ताबूत में अंतिम कील माना जायेगा हालाँकि १९९५ में किसी तरह इसका प्रकाशन प्रारम्भ भी की गयी लेकिन वह टिक नहीं पाया . 










    

Sunday, 12 October 2014

यज्ञोपवीत समारोह

दरभंगा को समझने के लिए समय , स्थान  और सन्दर्भ को जानना जरुरी  है।शादी समारोह की चर्चा तो हमने खूब सुनी है आज मैं दरभंगा में हुए एक  यज्ञोपवीत का चर्चा करेंगे। ६ फ़रवरी से ९ फरवरी १९४१ को दरभंगा में हुए इस यज्ञोपवीत में   जयपुर , जोधपुर , बनारस ,ग्वालियर,धौलपुर , कश्मीर ,टेकारी ,त्रिपुरा ,कूचबिहार ,मयूरभंज ,डुमराऊँ ,बर्दवान ,नेपाल , कसिमबाज़ार ,रामगढ ,छोटानागपुर ,मुंगेर, शिवहर ,  कपूरथला ,हैदराबाद,पयागपुर ,ओइल ,पंसबकोटे,पटियाला   आदि के  राजा - महाराजा तथा उनके प्रतिनिधि  ,डा राजेंद्र प्रसाद,सर्वपल्ली राधाकृष्णन ,नवाब सर के जी  ऍम  फारूकी , माननीय राजयपाल बिहार ,माननीय हूसैन इमाम ,रायबहादुर राधाकृष्ण जालान ,पंडित  दौर्गादत्ती शास्त्री ,गोस्वामी गणेशदत्तजी ,महामहोपाध्याय पंडित हरिहर कृपालु ,के पी सिन्हा ,I.C.S ,रायबहादुर एस  एन  सहाय ,M.L.A   ,रायबहादुर श्रीनारायण मेहता , रायबहादुर लाला रामसरन दास ,एन सेनापरी ,I.C. S ,एस.एम. धर ,I.C.S ,सी.पी.एन सिन्हा ,M.L.A ,  महामहोपाध्याय डा. सर गंगानाथ झा ,डा.अमरनाथ झा, जैसे देश के गणमान्य लोगों ने शिरकत की। इस समारोह में किया सब कार्यक्रम हुआ यह थोड़ी देर में। पहले  बता दूँ कि  उन्हें दरभंगा में कहाँ ठहराया गया था।  आनन्दबाग बाग और रामबाग पैलेस को छोड़कर   नरगौना  पैलेस ,बेला पैलेस ,राज गेस्ट हाउस (वर्तमान में महात्मा गांधी अतिथिशाला ),विश्राम कुटीर ( इनकम टैक्स ऑफिस ),लालबाग़ गेस्ट हाउस ,हराही हाउस ,बंगला नंबर ६ डेनबी रोड और गिरीन्द्र मोहन रोड स्थित बंगलों  और रेलवे सैलून,कैंप मानसरोवर ,राज मैदान , विशेश्वर मैदान में अतिथियों का ठहरने का इंतजाम था. अतिथियों को लाने- ले- जाने के लिए बग्घी , सजे हुए हाथी का रथ तथा कार मौजीद थे , इन सभी ठहरने के जगहों पर चाय- नाश्ता और   खाने का बंदोबस्त था।अतिथियों की आगवानी  महाराजा कामेश्वर सिंह और राजा बहादुर विशेस्वर सिंह पाग के साथ  मिथिला के परिधान में  हवाई अड्डा ,रेलवे स्टेशन पर स्वयं कर रहे थे।  रामबाग में  ८. ३० बजे पूर्वाह्न से २. ३० बजे अपराह्न  में वैदिक समारोह ,३ बजे से टेनिस ,स्क्वाश ,स्पोर्ट्स,कुश्ती ,पोलो ,फुटबॉल,शाम में   आतिशबाजी , बैंक्वेट ,संस्कृत ड्रामा ,हिंदी फिल्म' स्ट्रीट सिंगर'  ,ख्याति प्राप्त नर्तक उदयशंकर का भारतीय शास्त्रीय नृत्य ,कैब्रेट ,पंडितों को  राधाकृष्णन का सम्बोधन और धोती भेंट कर सम्मानित किया जाना ,उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का शहनाई वादन ,शास्त्रीय संगीत तथा आनन्दबाग में गार्डेन पार्टी  का आयोजन चारों दिन था।रौशनी से जगमगता सड़क ऐसा कि सुई भी गिरे  रात में तो  मिल जाय. रामबाग के आंगन के जिस मंडप पर वैदिक कार्यक्रम था उसी के बगल में सामानांतर पक्का चबूतरा राजा - महाराजा  के बैठने के लिए था। दरभंगा देश - विदेश के अतिथियों से अट्टापट्टा था कोई दरभंगा की   खूबसूरती और वैभव देख कर मंत्रमुग्ध था तो कोई इस शहर के भाग्य से ईष्या कर रहा था परन्तु कुछ गरीबों के लिए सोच रहे थे। 
   इसी कालखण्ड में ७ फ़रवरी को १२. १० बजे कामेश्वरी प्रिया पुअर होम का उद्घाटन महामहिम राज्यपाल,बिहार द्वारा दरभंगा  में हुआ।     


Sunday, 31 August 2014

THE DARBHANGA IMPROVEMENT TRUST BILL,1934

THE DARBHANGA IMPROVEMENT TRUST BILL,BILL NO.7 OF 1934 IN THE BIHAR AND ORISSA LEGISLATIVE COUNCIL

 Mr. W. B. Brett moved on behalf of the Government.He said that I need not repeat the story of what happened in Darbhanga on the afternoon of the 15th January 1934. It is sufficient to remind you that it was one of the three large towns in Bihar which suffered most damage in thee earthquake. Soon after the earthquake the Maharajadhiraja came forward with an office to lend a large sum of money to finance an Improvement Trust,which should replan the congested portions of the town and rebuild them in such away that they would not be such a source of danger to the lives of the inhabitants as they were in the last earthquake. When that proposal came to be considered and examined it was felt that there were certain difficulties in the way of an Improvement Trust working entirely with borrowed capital. As most of You are aware the Improvement Trusts are functioning in the big presidency towns  of which Calcutta is the nearest and the best example. There the Improvement Trust can work on borrowed capital,because there is a keen demand for building sites, and if congested bazaars are opened up with good roads you can sell the site at a good price.But it is impossible to hope that you should get conditions like that in a town like Darbhanga. Darbhanga I should describe as a large country town and it is quite certain that an Improvement Trust there must lose a certain portion of the capital in carrying out a scheme of that nature . So the facts were faced , and the proposal was changed to its present form. As His Excellency has just told you , the Maharajadhiraja”s  offer, as it now stands , is that he will make a free gift of five lakhs to the Trust  and that he will further advance as such as much money is needed for work of the Trust up to a further total of nine lakhs. These nine lakhs will have to be repaid in the end, but the five lakhs will not. The latter sum is available for,and is expected to be used in , meeting the amount by which the outgoings of the Trust will probably exceed its receipts when it comes to excute the scheme. It is not enable such a Trust to be formed that I have introduced this Bill. Unless  there is a properly constituted  Trust, it is impossible for us to accept this most generous offer on the part of the Maharajadhiraja and the whole thing must fall to the ground.
 The select committee to which the Darbhanga Improvement Bill,1934,has been referred to consist of the following members--
  1. Mr. Sachchidananda Sinha.
   2. Maulvi Shaikh Muhammad Shafi.
  3. Maulvi Muhammad Hasan Jan,
  4. Rai Bahadur Shyamnandan Sahay,
 5. Babu Chandresekar Prasad Narayan Sinha,
  6. Mr. W. B. Brett.
 Speaking on the Bill Mr. Sachchidanand Sinha said -- I rise to give my unstinted support to the motion that the Bill be passed. We have heard a good many criticisms in regard to this Bill and, with your permission, Sir, I would like to take up the time of the Council,just for a few minutes, to remove if I can, some of these misunderstandings. The chief contention on behalf of the opposers of the Bill has been that its provisions will impose a financial burden on the people of Darbhanga in some shape or form. The Trust will buy the land and houses which the scheme comprises; it will have to widen the roads and construct some new roads; it will have to spend money on clearing the new building sites, and will probably itself construct some of the shops. It will need a certain amount of staff--- both for its office and its outdoor staff, though as Government already have a Town Engineer at Darbhanga, it is not likely that the cost of the engineer's staff will be very great. On the receipt side, it will recover the large part of what it has spent on lands by selling sites to the displaced inhabitants. In many cases this will be done by exchange , and no actual money will pass. It will also recover what it spends on building shops, since it will sell these shops, either outright, or on the hire-purchase system, to displaced inhabitants. It is carefully provided in the Bill that these prices should be reasonable, and within the means of the purchasers. All these provisions constitute genuine safeguards against any imposition on the residents. But that is nt all.

Thursday, 19 June 2014

MEMORIAL TO THE EXCELLENCY THE RIGHT HONOURABLE BARON SINHA OF RAIPUR , Governor of Bihar & Orissa From Maharajadhiraj of Darbhanga in 1921.

MAY IT PLEASE YOUR EXCELLENCY,--
      1.On this a rare, memorable occasion when His Most Gracious Majesty's greatest gift to this Ancient and Great Country--- a New Age of rights and privileges---is being introduced through Royal Representatives of His Majesty bringing a message of hope.peace and good-will to this country, may I invite Your Excellency and through Your Excellency the Imperial Government to give kind attention to a question which though primarily a personal question is yet a question is  its general aspect intimately connected with the scheme of self government for this country of ancient histories and tradition?
    2.To begin the question, I am deeply grateful to Government for the honours and distinctions which have been conferred upon me from time to time ;but there yet remains that question of great importance to me and to my House--- the question of restoration of the ruling powers enjoyed by my forefathers before the East India Company took possession of North Bihar, which I beg leave to submit hereby for consideration
    3..Representatives of public opinion both here and in England have pointed out the advantages, desirability, and claims of certain class of ancient families and tracts to be erected into Ruling Houses and Principalities. That desirability seems to have received recognition also from such high authority as the Right Hon'ble Mr. Montagu, who on the 10th of July,1917, speaking before the House of Commons about the would-be.constitutional India described it as "the great self-governing dominions and provinces of India organised and co-ordinated with great principalities-- the existing principalities, and perhaps new ones.-- not one great Home Rule Country but a series of self - governing provinces and principalities federated by one Central Government."
     4.There are tracts in this country which by reason of history, associations, traditions,language and similar factors are marked out as distinct political individualities. It is submitted that it is those tracts to which the Reform should be extended in the first instance in the way of erecting  "New Principalities." In other words, where tracts had been organisms-- "principalities"-- in the near past, where life is still traceable in traditions and institutions, the scheme of self-government in this aspect be applied to them and the tracts be revived in full life, into full political persona.
   5. I beg to submit that the necessary conditions,enviornments and qualifications are to be found in the part of Tirhut which has been known as Mithila since Vedic times-- since the facts related in the Epics (the Ramayana and Mahabharata ). It lies mainly in the districts of Darbhanga and Muzaffarpur extending north right up to the foot of the Himalayas. It stands out in Northern Bihar by its history, language (Maithili)and literature as a national unit , a separate entity. It has been the seat of a Hindu kingdom since earliest times. Mostly the kingdom of Mithila was territorially identical with Tirhut; at times that kingdom included the whole of Northern  Bihar and beyond. Under my own ancestors the whole of Sirkar Tirhut, greater portion of the district of Purnea,a portion of north Bhagalpur and also a small portion of Champaran, had come within its limits. For centuries even before the rise of my House, the rulers of Mithila had been Brahmins. Its literature flourished under them and continued under my House; it is distinctly national. So is the very language and script in which that language is written.. No other unit in India continued the Hindu tradition unbroken in Muhammadan times up to the advent of the British Power. Mithila alone can claim to have been the intact home of orthodox Hindu civilisation, where even scribes wrote documents in Sanskrit up to the 18th century, where Hindu Law was administered by Hindu Lawers until the Dewany, where Hindu philosphies and sciences are studied in every village even to-day.
    6. Sirkar Tirhut then comprised 84 Parganas covering the greater parts of the districts of Darbhanga and Muzaffarpur. The boundries of the Sirkar in the grant of Mm Mahesh Thakur are said to have been "At Ganga to Sang-- As kosa to Ghosa,"that is, from the Ganges in the south to the mountain in the north-- from the river Kosi in the east to the Gandak in the west. This couplet laying down the boundries is printed in the Survey Settlement Report of the Purnia district. By subsequent grants to my ancestors by the Moghul Emperors about half of Purnia and a portion of Bhagalpur was added to their territories.
       7. Mithila, if not the whole of Tirhut, has thus the strongest claims to be raised again into its former political persona-- an Indian State..